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“सिखी को सनातन से अलग बताने वालों के लिए — शास्त्र और इतिहास का जवाब”

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सिख परम्परा और सनातन धारा: विरोध नहीं, विकास की कहानी.. भारत की आध्यात्मिक परम्परा का मूल सिद्धांत सदैव एक ही रहा है — परमसत्ता एक है, नाम अनेक हैं। ऋग्वेद कहता है, “एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” — सत्य एक है, ज्ञानी उसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं। उपनिषद उद्घोष करते हैं, “एकमेवाद्वितीयम्” — वह एक है, दूसरा कोई नहीं। यही धारा आगे चलकर गुरमत में “इक ओंकार” के रूप में प्रकट होती है। यह कोई नया दर्शन नहीं, बल्कि उसी सनातन आध्यात्मिक प्रवाह का निडर और शुद्ध उद्घोष है। Guru Granth Sahib में “राम” शब्द का प्रयोग इस सत्य को और स्पष्ट करता है। अंग 885 पर लिखा है — “एकु रामु दसरथ का बेटा, एकु रामु घट-घट में बैठा।” यहाँ दशरथ पुत्र राम को नकारा नहीं गया, बल्कि यह बताया गया कि एक ऐतिहासिक राम हैं और एक वह सर्वव्यापक राम हैं जो प्रत्येक हृदय में विराजमान हैं। अंग 1083 पर भक्त कबीर कहते हैं — “दसरथ सूत तिहु लोक बखाना, राम नाम का मरम न जाना।” यह अस्वीकार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक गहराई का विस्तार है। इसी ग्रंथ के अंग 1349 पर लिखा है — “अवल अलह नूर उपाया” — पहले एक ही नूर से सबकी रचना हुई। यह वही वैदिक...